पाकिस्तान में संविधान में तेज़ी से किए जा रहे संशोधनों को लेकर संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग (UN Human Rights Office) ने गंभीर चिंता व्यक्त की है। हाल ही में, देश में एक और फ़ेडरल कॉन्स्टिट्यूशनल कोर्ट (FCC) का गठन किया गया, जिसके बाद संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार हाई कमिश्नर वोल्कर टर्क ने स्पष्ट बयान जारी किया है कि ये बदलाव देश की न्यायिक स्वतंत्रता को गंभीर रूप से कमजोर कर रहे हैं।
टर्क ने कहा कि पाकिस्तान द्वारा जल्दबाजी में अपनाए गए ये संवैधानिक संशोधन न केवल न्यायिक स्वतंत्रता को कमज़ोर करते हैं, बल्कि सैन्य जवाबदेही (Military Accountability) और कानून के शासन (Rule of Law) को लेकर भी गंभीर चिंताएं पैदा करते हैं।
जल्दबाजी में किए गए संशोधन
मानवाधिकार प्रमुख ने 26वें संशोधन (जिसमें पाकिस्तान के मुख्य न्यायाधीश का कार्यकाल अधिकतम 3 साल कर दिया गया) और नियुक्ति के नए तरीकों जैसी चीज़ों का ज़िक्र किया। उन्होंने कहा कि इन संशोधनों को बिना किसी व्यापक परामर्श और कानूनी समुदाय के लोगों से चर्चा किए बिना अपनाया गया था, जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया के ख़िलाफ़ है।
टर्क ने चेतावनी दी कि ये संशोधन सत्ता के अलग-अलग हिस्सों (कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका) के बीच संतुलन के सिद्धांत के खिलाफ हैं। यह सिद्धांत कानून को मजबूत करता है और पाकिस्तान में मानवाधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करता है।
27वां संशोधन और FCC का गठन
देश में 13 नवंबर को 27वां संशोधन किया गया, जिसके तहत एक नया फ़ेडरल कॉन्स्टिट्यूशनल कोर्ट (FCC) बनाया गया। यह नया कोर्ट अब सभी संवैधानिक मामलों पर अधिकार रखेगा। इस बदलाव के बाद, देश का सुप्रीम कोर्ट सिर्फ़ नागरिक और आपराधिक मामलों को ही देखेगा।
FCC के पहले मुख्य न्यायाधीश और पहले समूह के न्यायाधीशों को राष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री की सलाह पर पहले ही नियुक्त कर दिया है। इसके अलावा, जजों की नियुक्ति, पदोन्नति और तबादले के तरीकों में भी ऐसे बदलाव किए गए हैं जिससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता कमजोर होने का बड़ा ख़तरा पैदा हो गया है।
संयुक्त राष्ट्र की चेतावनी: बढ़ रहा राजनीतिक हस्तक्षेप
वोल्कर टर्क ने ज़ोर देकर कहा कि ये बदलाव मिलकर न्यायपालिका को राजनीतिक हस्तक्षेप और कार्यपालिका (Executive) के नियंत्रण के अधीन करने का ख़तरा पैदा करते हैं।
उन्होंने कहा कि न तो कार्यपालिका और न ही विधायिका को ऐसी स्थिति में होना चाहिए कि वे न्यायपालिका को नियंत्रित या निर्देशित कर सकें। न्यायिक स्वतंत्रता का मूल आधार यह है कि अदालतें सरकार के राजनीतिक दखल से पूरी तरह मुक्त हों। टर्क ने स्पष्ट किया कि "अगर जज स्वतंत्र नहीं होते, तो वे कानून को सबके लिए समान रूप से लागू करने और राजनीतिक दबाव के बीच मानवाधिकारों की रक्षा करने में संघर्ष करते हैं।"
जवाबदेही होगी कमजोर'
संशोधनों में एक और चिंताजनक प्रावधान है, जिसके तहत राष्ट्रपति, फील्ड मार्शल, मार्शल ऑफ द एयर फोर्स और एडमिरल ऑफ द फ्लीट को आजीवन आपराधिक मुकदमों और गिरफ्तारी से छूट दी गई है।
टर्क ने इस पर चिंता जताते हुए कहा कि "इस तरह की व्यापक छूट जवाबदेही को कमज़ोर करती है, जबकि जवाबदेही मानवाधिकार ढांचे और कानून के शासन के तहत सेना पर लोकतांत्रिक नियंत्रण का मूल सिद्धांत है।"
टर्क ने निष्कर्ष में कहा, "मुझे चिंता है कि ये संशोधन पाकिस्तान के लोगों के लिए लोकतंत्र और कानून के शासन के सिद्धांतों के लिए खतरे पैदा कर सकते हैं।" ये बदलाव मिलकर अदालत के फैसलों में राजनीतिक हस्तक्षेप और कार्यपालिका के नियंत्रण में काम करने का खतरा पैदा करते हैं।